संदर्भ
ज्योतिष शब्दावली
ज्योतिष के जो शब्द हम इस्तेमाल करते हैं, वे सब एक जगह। जो शब्द आपके अपने हैं — दशा, लग्न, नक्षत्र — उनके बारे में यहाँ यह लिखा है कि वे आपके जीवन के बारे में क्या बताते हैं। और जो शब्द सचमुच किताबी हैं, उन्हें सरल हिंदी में समझाया गया है।
कुंडली की बुनियाद
- अस्तAsta
- अस्त ग्रह — जो सूर्य के इतने पास आ गया हो कि खुलकर काम न कर सके। इसका मतलब हार नहीं, बस उस ग्रह के काम में थोड़ा और सहारा लगाना पड़ता है।सूर्य से तय दूरी के भीतर; हल्का, मध्यम या गहरा — तीन दर्जे।
- कर्म
- कर्म और उसकी गति — जो किया जा चुका है उसने क्या चला दिया है, और आज जो कर रहे हैं वह आगे क्या तय कर रहा है। कुंडली झुकाव दिखाती है; कर्म आपका अपना है।
- कर्म चक्रKarma cakra
- आपके जीवन की समयरेखा — कुंडली में जो अध्याय अभी चल रहे हैं, और हर अध्याय आपसे क्या माँग रहा है।कर्मज्ञान का अपना पाठ: दशा और गोचर को कर्म के एक चक्र की तरह पढ़ना — 'आज' इस पल के लिए, 'जीवन नक्शा' लंबी राह के लिए।
- कुंडलीKuṇḍalī
- आपकी जन्म कुंडली — जिस पल और जिस जगह आपने पहली साँस ली, उस समय के आकाश का नक्शा।
- गुलिक
- गुलिक — शनि से जुड़ा एक छाया बिंदु, जो जीवन के उन हिस्सों की ओर इशारा करता है जहाँ थोड़ी और सावधानी काम आती है।उपग्रह (अदृश्य बिंदु), दिन में शनि के हिस्से से निकाला जाता है।
- चंद्र राशिRāśi
- जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में था, वही आपकी चंद्र राशि — वैदिक राशिफल इसी से पढ़ा जाता है, और अख़बारों वाली सूर्य राशि से यह अक्सर अलग निकलती है।
- दशाDaśā
- जीवन के अध्याय — हर दशा किसी एक ग्रह की है, और वह ग्रह उन बरसों को अपना रंग दे देता है। अभी कौन-सी दशा चल रही है, इससे यह पता चलता है कि यह समय किस बात का है।
- पंचांगPañcāṅga
- दिन के पाँच अंग — तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार। इन्हीं पाँच से दिन का पूरा मिज़ाज बनता है, और शुभ-अशुभ समय निकलता है।पाँच अंग: तिथि, नक्षत्र, योग, करण, वार।
- मांदिMāndi
- मांदि — शनि से जुड़ा दूसरा छाया बिंदु, जिसे गुलिक के साथ मिलाकर पढ़ा जाता है।
- राशिRāśi
- आपकी चंद्र राशि — जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में था। वैदिक ज्योतिष सबसे पहले इसी को देखता है, क्योंकि मन का पता चंद्र से चलता है।
- लग्नLagna
- जन्म के समय पूरब में जो राशि उग रही थी, वही आपका लग्न — कुंडली के बारहों भाव इसी से गिने जाते हैं।
- वक्रीVakrī
- वक्री ग्रह — जो पृथ्वी से देखने पर पीछे की ओर चलता दिखता है। ऐसा ग्रह अपना फल भीतर की ओर मोड़ देता है, और देता देर से है — पर देता ज़रूर है।यह केवल दिखने वाली गति है; कुंडली में इसे R से चिह्नित किया जाता है।
- वर्ग कुंडली
- वर्ग कुंडली — जन्म कुंडली को दोबारा बाँटकर जीवन के किसी एक क्षेत्र को पास से देखना, जैसे करियर के लिए D10 और विवाह के लिए D9।
- सूर्य राशि
- जन्म के समय सूर्य जिस राशि में था — पश्चिमी अख़बारों का राशिफल इसी से चलता है। भारत में राशिफल चंद्र राशि से पढ़ा जाता है, इसीलिए दोनों अक्सर अलग निकलते हैं।निरयन (वैदिक) सूर्य राशि सायन से लगभग 24° हट जाती है, इसलिए दोनों पद्धतियाँ प्रायः अलग जवाब देती हैं।
पंचांग
- अभिजित मुहूर्तAbhijit muhūrta
- दोपहर के आसपास का वह छोटा-सा शुभ समय, जिसमें कोई भी काम शुरू किया जा सकता है। और मुहूर्त न मिले तो यह हमेशा हाज़िर रहता है।
- करणKaraṇa
- तिथि का आधा हिस्सा — समय की सबसे बारीक परत, जिससे किसी काम का ठीक-ठीक मुहूर्त निकाला जाता है।
- ताराTārā
- आज का नक्षत्र आपके जन्म नक्षत्र से कैसा बैठ रहा है — दिन आपके साथ है या थोड़ा सँभलकर चलने का है, यह उसी से पता चलता है।ताराबल: जन्म नक्षत्र से नौ की गिनती।
- तिथि
- चंद्रमा की कला से बना दिन — तीस तिथियों में से एक। तिथि दिन का स्वभाव तय करती है, इसीलिए व्रत-त्योहार इसी से चलते हैं।
- नक्षत्रNakṣatra
- चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो, वही। सत्ताईस नक्षत्र हैं, और हर एक दिन को अपना अलग मिज़ाज देता है — आपका जन्म नक्षत्र आपकी दशाओं का भी आधार है।
- ब्रह्म मुहूर्तBrahma muhūrta
- सूरज निकलने से पहले का वह समय जो साधना और ध्यान के लिए सबसे अच्छा माना गया है। मन इस समय सबसे साफ़ रहता है।
- योग
- सूर्य और चंद्र की मिली-जुली स्थिति से बना दिन का योग — यह दिन के मूड को रंग देता है।
- राहुकालRāhu kāla
- दिन का वह डेढ़ घंटा जो नई शुरुआत के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। कोई शुभ काम शुरू करना हो तो इससे पहले या बाद का समय चुन लें — बाकी दिन खुला है।
- वारVāra
- वार — हफ़्ते का दिन, और हर दिन का अपना ग्रह स्वामी, जो उस दिन शुरू हुए हर काम पर अपना रंग चढ़ा देता है।
समय और मुहूर्त
- गंडमूलGaṇḍa-mūla
- गंडमूल — कुछ संधि नक्षत्रों में हुआ जन्म, जिसके लिए परंपरा में एक छोटी-सी पूजा बताई गई है। यह कोई कमी नहीं, बस थोड़ी देखभाल की एक बात है।बुध और केतु के अधिकार वाले छह नक्षत्र, जो राशि संधि पर पड़ते हैं।
- गुलिक कालGulika kāla
- दिन का वह हिस्सा जिस पर गुलिक का अधिकार है — शुभ काम की शुरुआत के लिए इसे परंपरा से छोड़ दिया जाता है। बाकी दिन में समय की कोई कमी नहीं।
- पंचकPañcaka
- महीने में पाँच दिन का वह दौर, जिसमें कुछ काम — खासकर निर्माण और दक्षिण की यात्रा — सोच-समझकर किए जाते हैं। ज़रूरी काम टलें नहीं, बस पंचक उतरने के बाद का दिन बेहतर रहेगा।चंद्रमा का धनिष्ठा (उत्तरार्ध) से रेवती तक गोचर।
- मुहूर्तMuhūrta
- शुभ समय — किसी काम को शुरू करने के लिए वह घड़ी चुनना जब आकाश उसका साथ दे। घर में जिसे 'मुहूर्त निकलवाना' कहते हैं, वही।
- यमगंडYamagaṇḍa
- दिन का वह समय जो नई शुरुआत के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। कोई काम शुरू करना हो तो इससे पहले या बाद का समय चुन लें।
वर्ग कुंडलियाँ
- D1Rāśi
- आपकी मुख्य जन्म कुंडली — बाकी हर पाठ इसी पर टिका है।राशि चक्र — ज्योतिष की मूल कुंडली, जिससे सारी वर्ग कुंडलियाँ निकलती हैं।
- D10Daśāṁśa
- करियर, पेशा, और दुनिया में आपकी पहचान।दशांश — दसवाँ वर्ग।
- D12Dwādaśāṁśa
- माता-पिता और पुरखों की विरासत।द्वादशांश — बारहवाँ वर्ग।
- D16Ṣoḍaśāṁśa
- गाड़ी, सुख-सुविधाएँ और ऐशो-आराम।षोडशांश — सोलहवाँ वर्ग।
- D2Horā
- कमाई और धन के बारे में आपकी कुंडली क्या कहती है।होरा — दूसरा वर्ग।
- D20Viṁśāṁśa
- साधना और भीतरी विकास।विंशांश — बीसवाँ वर्ग।
- D24Chaturviṁśāṁśa
- पढ़ाई, सीख और बुद्धि की गहराई।चतुर्विंशांश — चौबीसवाँ वर्ग।
- D27Bhāṁśa
- भीतरी ताकत और कमज़ोरी — क्या आपको सँभालता है और क्या रोकता है।भांश / नक्षत्रांश — सत्ताईसवाँ वर्ग।
- D3Drekkāṇa
- भाई-बहन, हिम्मत, और आसपास के लोग।द्रेष्काण — तीसरा वर्ग।
- D30Triṁśāṁśa
- छिपी हुई चुनौतियाँ और जीवन की कड़ी सीखें।त्रिंशांश — तीसवाँ वर्ग।
- D4Chaturthāṁśa
- घर, सुख, ज़मीन-जायदाद और मन की नींव।चतुर्थांश — चौथा वर्ग।
- D40Khavedāṁśa
- माँ के कुल से जो आपको मिला।खवेदांश — चालीसवाँ वर्ग।
- D45Akṣavedāṁśa
- पिता के कुल से जो आपको मिला।अक्षवेदांश — पैंतालीसवाँ वर्ग।
- D60Ṣaṣṭiāṁśa
- पिछले जन्मों का कर्म — कुंडली की सबसे गहरी परत।षष्ट्यंश — साठवाँ वर्ग।
- D7Saptāṁśa
- संतान और जो आप पीछे छोड़कर जाते हैं।सप्तांश — सातवाँ वर्ग।
- D9Navāṁśa
- विवाह, जीवनसाथी और आत्मा का धर्म — आपकी भीतरी बनावट।नवांश — नौवाँ वर्ग। D1 के बाद सबसे अहम।
दशाएँ
- अंतर्दशाAntar-daśā
- महादशा के भीतर का छोटा दौर — साल-दर-साल की कहानी यहीं से बारीक होती है।
- अष्टम शनिAṣṭama Śani
- शनि का चंद्र से आठवें भाव से गुज़रना — भीतर से गहरे बदलाव का दौर। जल्दबाज़ी छोड़ें और एक-एक काम पूरा करके उठाएँ, यह समय उसी तरह पार होता है।जन्म चंद्र से आठवें भाव में शनि। ढैया का ज़्यादा माँग करने वाला दौर।
- उपचयUpacaya
- उपचय भाव — तीसरा, छठा, दसवाँ और ग्यारहवाँ। ये वे भाव हैं जहाँ धीरे-धीरे की गई मेहनत समय के साथ बढ़ती जाती है।उपचय भाव: 3, 6, 10, 11। यहाँ पाप ग्रह भी समय के साथ फल देने लगते हैं।
- कंटक शनिKaṇṭaka Śani
- शनि का चंद्र से चौथे भाव से गुज़रना — घर-परिवार और मन के चैन पर दबाव आ सकता है। घर की बुनियादी बातें सँभाल लें, यह दौर उन्हीं को मज़बूत करने आया है।जन्म चंद्र से चौथे भाव में शनि। ढैया के दो दौरों में से एक।
- ढैयाDhaiyyā
- शनि का ढाई साल का दौर, चंद्र से चौथे या आठवें भाव से — काम धीमा, पर सोच गहरी हो जाती है। इसे रुकावट नहीं, नींव पक्की करने का समय मानें।
- महादशाMahā-daśā
- जीवन का वह बड़ा अध्याय जो अभी चल रहा है — बरसों का रंग यही तय करती है।
- विंशोत्तरी दशाViṁśottarī daśā
- आपके जीवन की समयरेखा — अभी कौन-सा ग्रह आपकी गाड़ी चला रहा है, यही बताती है।चंद्र नक्षत्र से चलने वाला 120 साल का क्रम — समय देखने की मुख्य पद्धति।
- शनि ढैयाDhaiyyā
- शनि का ढाई साल का दौर, जो चंद्र से चौथे या आठवें भाव से गुज़रता है — साढ़े साती से हल्का, पर सिर झुकाकर काम करने का समय। जो नियम से करेंगे, वही टिकेगा।जन्म चंद्र से चौथे (कंटक) या आठवें (अष्टम) भाव में शनि।
- साढ़े सातीSāḍesātī
- शनि का वह साढ़े सात साल का दौर जो आपकी चंद्र राशि से होकर गुज़रता है — यह डरने का नहीं, मेहनत का हिसाब देने और खुद को पक्का करने का समय है। दिनचर्या सादी रखें और अपने कर्तव्य पूरे करें, यही दौर की सबसे बड़ी कमाई है।जन्म चंद्र से बारहवें, पहले या दूसरे भाव में शनि।
भाव
- केंद्र
- केंद्र भाव — पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ। ये आपके जीवन का दिखने वाला हिस्सा हैं, जहाँ बैठा ग्रह अपना काम खुलकर करता है।
- त्रिकोणTrikoṇa
- त्रिकोण भाव — पहला, पाँचवाँ और नवाँ। यहीं से आपका धर्म और भाग्य पढ़ा जाता है।
- दुःस्थानDuḥsthāna
- दुःस्थान — छठा, आठवाँ और बारहवाँ भाव। यहाँ संघर्ष ज़रूर है, पर सबसे तेज़ बढ़ना भी यहीं होता है।
- लग्न
- आपका लग्न — वह चश्मा जिससे दुनिया आपको देखती है, और जिससे आपकी पूरी कुंडली के बारह भाव गिने जाते हैं।
ग्रह बल और बनावट
- अष्टकवर्गAṣṭakavarga
- अष्टकवर्ग — एक शास्त्रीय गिनती, जो बिंदुओं में बताती है कि किस भाव को ग्रहों का कितना सहारा मिल रहा है।हर ग्रह के लिए बारह भावों में आठ स्रोतों से मिले शुभ बिंदुओं की व्यवस्था।
- वर्गोत्तम
- वर्गोत्तम — जब कोई ग्रह जन्म कुंडली और नवांश, दोनों में एक ही राशि में बैठा हो। ऐसा ग्रह अपना फल दुगुनी मज़बूती से देता है।D1 और D9 में एक ही राशि में ग्रह — बल का प्रबल संकेत।
- षड्बलṢaḍbala
- षड्बल — एक शास्त्रीय गिनती, जो छह अलग-अलग नापों से बताती है कि आपकी कुंडली में कौन-सा ग्रह कितना दमदार है। यह कोई परीक्षा नहीं, कुंडली की एक नाप भर है।छह बल: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृग्बल।
योग
- गजकेसरी योग
- मन और बुद्धि एक-दूसरे का साथ देते हैं — सीखने और सही फ़ैसला लेने में यह बड़ी ताकत है।चंद्र से केंद्र (1/4/7/10) में गुरु।
- नीच भंग राजयोग
- कुंडली की एक कमज़ोरी जो आगे चलकर बड़ी ताकत बन जाती है।नीच भंग, जिससे राजयोग बनता है।
- पंच महापुरुष योग
- पाँच महापुरुष स्वभावों में से एक — किसी एक क्षेत्र में असाधारण देन।मंगल/बुध/गुरु/शुक्र/शनि का केंद्र में स्वराशि या उच्च का होना।
- राजयोग
- वह संयोग जो पद, अधिकार और पहचान को ऊपर उठाता है।केंद्रेश और त्रिकोणेश की युति या राशि परिवर्तन।
- विपरीत राजयोग
- जो कठिनाई शुरू में भारी लगती है, वही आगे चलकर ऊपर उठा देती है।छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामियों की आपसी स्थिति।
दोष
- काल सर्प दोषKāla-sarpa doṣa
- सातों ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाएँ — इसे ऐसा दौर माना जाता है जो जीवन की सीखों को एक जगह इकट्ठा कर देता है। यह कोई श्राप नहीं, बस मेहनत का पलड़ा थोड़ा भारी।राहु-केतु की धुरी के अनुसार अनंत, कुलिक आदि भेद; कई स्थितियों में यह भंग भी हो जाता है।
- नाड़ी दोषNāḍī doṣa
- सेहत और संतान के मामले में दोनों की ऊर्जा आपस में कितनी मिलती है।दोनों की चंद्र नक्षत्र की नाड़ी (आदि/मध्य/अंत्य) एक होना।
- भकूट दोषBhakūṭa doṣa
- मन और गृहस्थी के स्तर पर दोनों का तालमेल।दोनों की चंद्र राशियों का संबंध — 6-8 या 2-12 पड़ने पर चिह्नित होता है।
- मंगल दोषMaṅgala doṣa
- मंगल की तेज़ ऊर्जा दोनों तरफ़ बराबर है या नहीं — यही देखा जाता है। दोष कोई श्राप नहीं, बस एक जगह जहाँ थोड़ी और समझ चाहिए।लग्न या चंद्र से 1/2/4/7/8/12 भाव में मंगल — शास्त्रीय जाँच।
- रज्जु दोष
- रिश्ते की उम्र को लेकर एक परंपरागत जाँच।नक्षत्रों को शरीर के अंगों (सिर/कंठ/हृदय आदि) में बाँटकर की गई जाँच।
- वेध दोष
- एक का नक्षत्र दूसरे के नक्षत्र को रोकता है या नहीं।
कुंडली मिलान
- अष्टकूटAṣṭakūṭa
- अष्टकूट — कुंडली मिलान की वह शास्त्रीय जाँच जो आठ कसौटियों पर 36 गुणों में तौली जाती है।आठ कूट: वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी।
- अष्टपदी मिलानAṣṭapadī milana
- कुंडली मिलान के आठ चरण — गुण मिलान से आगे जाकर की गई गहरी जाँच।
- गुण मिलानGuṇa milana
- गुण मिलान — दो कुंडलियों के बीच अंकों से की जाने वाली मिलान जाँच। अंक पूरी कहानी नहीं होते, पर शुरुआत यहीं से होती है।
कारक
- आत्मकारकĀtma kāraka
- आत्मकारक — वह ग्रह जो आपकी कुंडली में सबसे आगे खड़ा है और आपके सबसे गहरे उद्देश्य को चला रहा है।किसी भी राशि में सबसे ज़्यादा अंश वाला ग्रह।
- कारकKāraka
- कारक — वह ग्रह जो किसी विषय का प्रतिनिधि होता है (जैसे शुक्र रिश्तों का)। उस विषय की बात उसी ग्रह से पूछी जाती है।
- कारकांश
- कारकांश — आपका आत्मकारक ग्रह नवांश में जिस राशि में बैठता है, वही। यह आत्मा का अपना लग्न है और आपका धर्म वहीं से पढ़ा जाता है।आत्मकारक की नवांश स्थिति, D1 पर उतारकर देखी जाती है।
पुरुषार्थ — जीवन के चार लक्ष्य
- अर्थ
- आपका काम, कमाई, और वह ज़मीन जिस पर बाकी सब खड़ा होता है।दूसरा, छठा और दसवाँ भाव (पृथ्वी त्रिकोण)।
- कामKāma
- आपकी इच्छाएँ, रिश्ते, और जीवन का वह रस जो जिया जाता है।तीसरा, सातवाँ और ग्यारहवाँ भाव (वायु त्रिकोण)।
- कुंडली का झुकाव
- आपकी कुंडली का वज़न किस ओर झुका है — जीवन का कौन-सा क्षेत्र आपके कर्म का मुख्य मैदान है।
- धर्म
- आपका उद्देश्य और आपके उसूल — वह रास्ता जिस पर चलने के लिए आप बने हैं।पहला, पाँचवाँ और नवाँ भाव (अग्नि त्रिकोण)।
- पुरुषार्थPuruṣārtha
- जीवन के चार लक्ष्य — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। चारों साथ चलें, तभी जीवन पूरा कहलाता है।
- मोक्षMokṣa
- भीतर का काम — पकड़ ढीली करना, और अपने आप से आगे निकल जाना।चौथा, आठवाँ और बारहवाँ भाव (जल त्रिकोण)।
- शिव–शक्तिŚiva–Śakti
- कुंडली के दो सिरे — शिव की ओर के ग्रह भीतर खींचते हैं, शक्ति की ओर के ग्रह बाहर काम में उतरते हैं। दोनों की ज़रूरत है।तांत्रिक कार्य-धुरी। शिव पक्ष के ग्रह समेटते हैं, शक्ति पक्ष के ग्रह प्रकट करते हैं।
पिछले जन्म का कर्म
- पिछले जन्म का प्रमुख ग्रह
- पिछले जन्म का प्रमुख ग्रह — वह कर्म-सूत्र जिसे आपकी आत्मा इस शरीर तक साथ लाई है।
- पिछले जन्म का प्रमुख ग्रह
- वह ग्रह जिसके कर्म आपकी आत्मा पिछले जन्म से साथ लेकर आई है।चंद्र नक्षत्र के स्वामी से विंशोत्तरी क्रम में +6 चलकर निकाला जाता है।
पद्धतियाँ और पैमाने
- KP पद्धति
- KP पद्धति — समय बताने की एक बहुत बारीक विधि, जो 'हाँ या नहीं' का जवाब घंटे नहीं, मिनट तक ले आती है।कृष्णमूर्ति पद्धति — राशि चक्र के 249 उप-विभाग।
- Swiss Ephemeris
- वह खगोलीय गणना-यंत्र जिससे ग्रहों की स्थिति निकाली जाती है — वही आँकड़े जिन पर पेशेवर खगोलशास्त्री भरोसा करते हैं।Astrodienst का संकुचित JPL पंचांग; छपे हुए पंचांग से कहीं ज़्यादा सटीक।
- अयनांश
- अयनांश — वह अंतर जिससे राशि चक्र को असली तारों के साथ बिठाया जाता है। इसी के कारण वैदिक और पाश्चात्य राशियाँ अलग निकलती हैं।सायन और निरयन राशि चक्र का अंतर।
- जैमिनी
- जैमिनी — ज्योतिष की एक पुरानी शाखा, जो कुंडली को चरकारकों की नज़र से पढ़ती है।जैमिनि ऋषि की सूत्र-आधारित पद्धति। कारकांश और चर दशा इसी की देन हैं।
- नाड़ी
- नाड़ी — कुंडली को बहुत छोटे हिस्सों में बाँटकर किया गया गहरा पाठ।150 नाड़ी अंश — हर अंश 12 कला का।
- निरयनNirayana
- निरयन — असली तारों के हिसाब से नापा गया राशि चक्र। वैदिक ज्योतिष यही इस्तेमाल करता है।पाश्चात्य सायन राशि चक्र से अयनांश (आज लगभग 24°) का फ़र्क़।
- लाहिरी अयनांशLāhirī ayanāṁśa
- लाहिरी अयनांश — भारत में सबसे ज़्यादा माने जाने वाला वह पैमाना, जिससे राशियाँ असली आकाश के साथ मिलाई जाती हैं। कर्मज्ञान की सारी गणना इसी पर होती है।उत्तर और दक्षिण, दोनों भारतीय परंपराओं का प्रचलित अयनांश।